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Narayan Thapa:: Redhat Certified Engineer(RHCE), Redhat Certified Technician(RHCT),PHP Programmer and IT consultant from Nepal

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एक होती है पत्नी, एक होती है प्रेमिका.

दोनों में ‘प’ अक्षर की समानता है. लेकिन पहले में ‘प’ में ‘र’ का जुड़ाव नहीं होता. शुरू में शायद होता हो जो विवाह के बाद नज़र नहीं आता.

अक्सर प्रेमी पति-पत्नी बनने के बाद प्रेमी नहीं रहते, ख़रीदी हुई जायदाद की तरह दोनों एक दूसरे के मालिक हो जाते हैं. दोनों एक-दूसरे की क़ानूनी जायदाद होते हैं. जिसमें तीसरे का दाखिला वर्जित होता है. समाज में भी, अदालतों में भी और नैतिकता के ग्रंथों में भी. वह आकर्षण जो शादी से पहले एक-दूसरे के प्रति नज़र आता है, वह कई बार के पहने हुए वस्त्रों की तरह, बाद में मद्धम पड़ जाता है.

मानव के इस मनोविज्ञान से हर घर में शिकायत रहती है. कभी-कभी यह शिकायत मुसीबत भी बन जाती है. दूरियों से पैदा होने वाला रोमांस जब नजदीकियों के घेरे में आकर हकीक़त का रूप धर लेता है तो रिश्तों से सारी चमक-दमक उतार लेता है. फिर न पति आकाश से धरती पर आया उपहार होता है और न पत्नी का प्यार खुदाई चमत्कार होता है.

मेरी एक ग़ज़ल का शेर है,

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है, जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती

हिंदी कथाकार शानी की एक कहानी है, शीर्षक है ‘आखें’. इसमें ऐसे ही एक प्रेम विवाह में फैलती एकरसता को विषय बनाया गया है. दोनों पति-पत्नी बासी होते रिश्ते को ताज़ा रखने के लिए कई कोशिशें करते हैं. कभी सोने का कमरा बदलते हैं, कभी एक दूसरे के लिए गिफ्ट लाते हैं, कभी आधी रात के बाद चलने वाली अंग्रेज़ी फ़िल्मों की सीडी चलाते हैं….मगर फिर वही बोरियत… अंत में कथा दोनों को एक पब्लिक पार्क मे ले जाती है, दोनों आमने-सामने मौन से बैठे रहते हैं.

इस उकताहट को कम करने को पति सिगरेट लेने जाता है, मगर जब वापस आता है तो उसे यह देखकर हैरत होती है कि पत्नी से ज़रा दूर बैठा एक अजनबी उसकी पत्नी को उन्हीं चमकती आँखों से देख रहा होता है, जिनसे विवाह पूर्व वह कभी उस समय की होने वाली पत्नी को निहारता था…

अर्थशास्त्र का एक नियम है, वस्तु की प्राप्ति के बाद वक़्त की क़ीमत लगातार घटती जाती है. पास में पानी का जो महत्व होता है, प्यास बुझने के पश्चात वही पानी में उतनी कशिश नहीं रखता.

मेरी एक कविता है;

पहले वह रंग थी
फिर रूप बनी
रूप से जिस्म में तब्दील हुई
और फिर…
जिस्म से बिस्तर बन के
घर के कोने में लगी रहती है
जिसको कमरे में घुटा सन्नाटा
वक़्त बेवक़्त उठा लेता है
खोल लेता है बिछा लेता है.

बूढ़े ग़ालिब के युग के जवान शायर दाग़ देहलवी थे.

उनके पिता नवाब शम्सुद्दीन ने अपनी बंदूक से देश प्रेम में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी को उड़ा दिया था. नवाब साहब को फाँसी दी गई और उनकी पत्नी अपने पाँच साल के बेटे को रामपुर में अपनी बहन के हवाले करके, जान बचाने के लिए इधर-उधर भागती रहीं. जहाँ उन्हें मदद मिली वहाँ-वहाँ इसकी क़ीमत उन्हें अपने शरीर से चुकानी पड़ी. जिसके नतीजे में दाग़ के एक भाई और बहन अंग्रेज़ नस्ल से भी हुए.

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चित्रांकन-लाल रत्नाकर

यह अभागिन महिला आख़िर में, आख़िरी मुगल सम्राट के होने वाले जानशीन मिर्ज़ा फखरू के निकाह में आई. यह 1857 से पहले का इतिहास है. महल में आने के बाद माँ को रामपुर में छोड़े हुए बेटे की याद आई और किस्मत, बदकिस्मत बेटे को रामपुर से लालकिले में ले आई.

1857 से एक साल पहले मिर्जा फखरू का देहांत हुआ और उसके बाद माँ और बेटा दोनों फिर से बेघर हो गए. दाग़ उस वक़्त 23-24 वर्ष के थे…वह शायर बन चुके थे. मशहूर हो चुके थे. शायरी ने उस समय के रामपुर नबाव को उन पर मेहरबान बनाया और उन्होंने फिर से घर-बार बसाया.

रामपुर में हर साल एक मेला लगता था. जिसमें देश की मशहूर तवायफ़ें अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन करती थीं. उन तवायफों में एक नवाब साहब के भाई की प्रेमिका थी. दाग़ का दिल उसी पर आ गया. उनका नाम था मुन्नी बाई हिजाब.

दिल की दीवानगी में अक्ल शामिल नहीं होती. इस दीवानगी में वह घर से बेघर भी हो सकते थे-जान भी ख़तरे में पड़ सकती थी. लेकिन मुहब्बत की दीवानगी पत्नी के मना करने के बावजूद नवाब साहब के नाम एक ख़त लिखवा देती है. खत में लिखा गया था, “नवाब साहब आपको ख़ुदा ने हर ख़ुशी से नवाज़ा है, मगर मेरे लिए सिर्फ़ एक ही ख़ुशी है और वह है मुन्नी बाई.”

नवाब तो दाग़ की शायरी के प्रशंसक थे. उन्होंने मुन्नी बाई के ज़रिए ही उत्तर भेजा. लिखा था - “दाग़ साहब हमें आपकी ग़ज़ल से ज़्यादा मुन्नी बाई अजीज़ नहीं है.” मुन्नी बाई दाग़ साहब की प्रेमिका के रूप में उनके साथ रहने लगीं. लेकिन जब मन में धन का प्रवेश हुआ तो मन बेचारा बंजारा बन गया और मुन्नी बाई उन्हें छोड़ के चली गईं.

दाग़ का शेर है

तू जो हरजाई है अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं, और सही

यूरोप में रिश्तों की इस उकताहट को ‘कॉनजुगल बोरडम’ यानी वैवाहिक उकताहट कहते हैं.

पति-पत्नी के संबंध की इस तब्दीली ने ही कोठों या तवायफों की संस्कृति को जन्म दिया था. कुछ साल पहले तक पत्नी के होते हुए किसी वेश्या से संबंध रखने को बुरा नहीं समझा जाता था. इस्मत चुग़ताई ने इस परंपरा के विरोध में ‘लिहाफ़’ नामक कहानी लिखी जिसमें पत्नी का एकांत उसे लेस्बियन यानी समलैंगिक बना देता है.

देश-विदेश की जितनी भी बड़ी प्रेम कथाएँ हैं, जिन पर महान काव्यों की रचना हुई है, उनमें कोई कथा पति-पत्नी के पात्रों में नज़र नहीं आती, हीर-रांझा हो, लैला-मजनूँ हो, सोहनी-महिवाल हो या शीरीं- फ़रहाद हो, इन सबका अंत मिलन पर नहीं वियोग पर होता है.

अजूबा प्रेम

मुगल शासन काल में, केवल दो अपवाद नज़र आते हैं. एक जहाँगीर और नूरजहाँ का प्यार और दूसरा ख़ुर्रम और अरजुमंद बानो का प्रेम.

लेकिन जहाँगीर और उसके सुपुत्र शाहजहाँ के इश्क में एक अंतर भी है. नूरजहाँ शेर अफ्गन की पत्नी थी जो बाद में जहाँगीर की मलिका बनी.

नूरजहाँ से जहाँगीर की कोई संतान भी नहीं है. ख़ुर्रम (जो बादशाह बनकर शाहजहाँ के नाम से जाना जाता है) और अरजुमंद (जो बाद में मुमताज़ महल बनी) का इश्क़ भी पति-पत्नी का इश्क़ है. लेकिन वह शाहजहाँ के 13 बच्चों की माँ बनकर भी बरक़रार रहा.

यह प्रेम संसार का एक अजूबा है. मुमताज़ महल का निधन चौदहवें बच्चे के जन्म के समय हुआ था. वह बुरहानपुर में मरी थीं. वहीं उन्हें दफ़्न भी किया गया था. लेकिन मुमताज़ से शाहजहाँ की मुहब्बत को मौत भी खत्म नहीं कर पाई. वह मुमताज़ की कब्र को भी अपने करीब रखना चाहता था. इसी लिए इसे बुरहानपुर में उसकी कब्र से निकलवाकर जमना के शांत किनारे ताजमहल में दोबारा सुलाया गया.

औरंगजेब ने जब शाहजहाँ को क़ैद कर दिया था तो वह क़ैदखाने की एक खिड़की से मुमताज़ के ताजमहल को ही देखा करता था.

शाहजहाँ और मुमताज़ जैसी मुहब्बत की आज हमारे संसार को ज़्यादा ज़रूरत है.

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